Prem Sudha

पद/श्लोक 1

यस्याः कदापि वसनाञ्चलखेलनोरु- धन्य अतिधन्यनिजबिम्बफलाधरायाः । द्रष्टुं प्रवृत्त इव तन्मुखचन्द्रबिम्बं- वल्गन्त्यनन्तमणिभूषणचक्रवालाः ॥

भावार्थ (Translation)

जिन श्रीराधा के कभी वस्त्रांचल के हिलने-डुलने से अत्यन्त धन्य-अतिधन्य बिम्बफल के समान अरुण अधर-प्रान्त की शोभा को देखने के लिये ही मानो उनके मुखचन्द्र-बिम्ब की ओर उनके अनन्त मणिमय आभूषणों के समूह उछल रहे हैं।